Top1 india news

No. 1 News Portal of India

दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के प्रतिनिधियों की इलाहाबाद में राज्य स्तरीय बैठक की गयी

1 min read

रिपोर्ट – सद्दाम हुसैन

यूपी: दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के प्रतिनिधियों की इलाहाबाद में राज्य स्तरीय बैठक की गयी। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान पूरे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की असली सच्चाई सामने आ गयी। लाखों लोग सरकार की आपराधिक लापरवाही से पैदा होने वाली ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में आईसीयू-बेड की किल्लत जैसी समस्याओं की वज़ह से मौत के मुँह में चले गये। बिना किसी तैयारी के लॉकडाउन थोपकर बहुत बड़ी आबादी को फ़ासिस्ट मोदी और योगी सरकार ने भूखा मरने के लिए छोड़ दिया। बेरोज़गारी की भयंकर स्थिति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि केवल मई-2021 में 1.5 करोड़ लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। अप्रैल और मई में 2.27 करोड़ लोगों की नौकरियां छीन गई हैं। नौजवानों की बहुत बड़ी आबादी हताशा-निराशा-अवसाद का शिकार होकर आत्महत्या तक के क़दम उठा रही है। इस स्थिति को मद्देनज़र रखते हुए बैठक में प्रतिनिधियों ने बातचीत करके सबको एकसमान सार्वभौमिक और निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने, पूरी चिकित्सा व्यवस्था का राष्ट्रीयकरण करने, देश के प्रत्येक नागरिक तक सार्वभौमिक राशन वितरण प्रणाली से भोजन की आपूर्ति करने, समान शिक्षा और रोज़गार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की माँग पर पूरे प्रदेश में लोगों को संगठित करने के लिए ‘जन स्वास्थ्य अधिकार मुहिम’ और ‘शिक्षा-रोज़गार अधिकार अभियान’ की रणनीति तय की।कोरोना महामारी के दौरान जब देश में चारों ओर मौत, बेबसी और लाचारी का एक ताण्डव चल रहा था तब इन सबके बीच फ़ासिस्ट मोदी सरकार चुपचाप बैठकर तमाशा देख रही थी। ऐसे दौर में भी जब जनता पर कहर टूट रहा था, तमाम प्राइवेट दवा व वैक्सीन बनाने वाली कम्पनियाँ मुनाफ़ा पीटने का अवसर तलाश रही थीं और अब भी तलाश रही हैं। देश में कालाबाज़ारी अपने चरम पर थी। फ़ासिस्ट सरकार की लापरवाही आम जनता के ऊपर हर तरीक़े से कहर बनकर टूट रही है। आँकड़ो के हिसाब से चलें तो सीएमआईई के हालिया रिपोर्ट के मुताबिक मई में बेरोज़गारी दर मार्च के 6.63 फीसदी से बढ़कर 14.45 फीसदी हो गई है। हालात की भयानकता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीएमआईई ने उन लोगों को बेरोज़गार के रूप में वर्गीकृत किया है, जिन्होंने नौकरी की तलाश की लेकिन एक सप्ताह में एक घंटे से कम काम प्राप्त किया। मतलब साफ़ है कि अब लोगों के पास सप्ताह में एक दिन तो छोड़िए एक घण्टे का भी काम नही हैं। फ़ासिस्टों की पूरी जमात, चाहे संघ परिवार की बात करें या भाजपा की, अपने आयोजनों के लिए कोरोना महामारी से बचाव के सारे बंदोबस्त कर ले रही है। लेकिन यही फ़ासीवादी सरकार संसाधनों की कमी का रोना रोकर विश्वविद्यालय, कॉलेज कैंपसों, कोचिंग संस्थानों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक हर उस जगह पर टाला लटका दिया गया जो पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा छात्रों-नौजवानों के भविष्य के लिए बुनियादी बना दी गयी है। पढ़ाई के नाम पर तमाम विश्वविद्यालयों द्वारा ऑनलाइन कक्षाएं थोपी जा रही हैं। जो दूर-दराज के गांवों में बसने वाले छात्रों और शहरी गरीब छात्र जो महँगे गैजेट नही खरीद सकते है, को शिक्षा के बुनियादी अधिकार से दूर करती जा रही है और इन छात्रों-नौजवानों को अवसाद की गहरी खाई में धकेल रही है। कोरोना संकट के दौरान दौरान देश में आत्महत्या की दर 30 फ़ीसदी बढ़ गयी है। भारत में आत्महत्या की दर वैश्विक औसत से 60 फ़ीसदी से भी ज्यादा है।
देश के छात्रों-नौजवानों और आम मेहनतकश जनता के पास अब केवल दो ही विकल्प है। या तो व्यवस्था के हाथों होने वाले इस क़त्लेआम को देखते रहे और आम लोगों की मौत से अपनी निगाहें फेर कर व्यवस्था द्वारा की जाने वाली हज़ारों हत्याओं के सहभागी बन जाएं। या फिर इस भयानक स्थिति के खिलाफ मुठ्ठी तानकर खड़ा हुआ जाय। अपने जैसे लाखों-करोड़ों लोगों को आवाज़ दी जाय। पूरे देश के चिकित्सा व्यवस्था के राष्ट्रीयकरण, सबके लिए निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था करने, सबको एक समान और निःशुल्क शिक्षा और सबको रोज़गार के नारे पर शहरों से लेकर गाँव तक में एक जनान्दोलन खड़ा किये बगैर इस पूरी स्थिति से नहीं निपटा जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright ©2021 All rights reserved | For Website Designing and Development call Us:+91 7080822042
Translate »